bhakti kaal ki pramukh pravritiyan - भक्तिकाल की प्रमुख प्रवृत्तियाँ

Arpit Nageshwar
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भक्तिकाल की प्रमुख प्रवृत्तियाँ - Bhakti Kaal ki Pramukh Pravritiyan

हिंदी साहित्य का इतिहास कई महत्वपूर्ण कालों में विभाजित किया गया है, जिनमें से भक्तिकाल एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रभावशाली काल माना जाता है। यह काल लगभग 1375 ई. से 1700 ई. तक माना जाता है। इस काल में कवियों ने भक्ति, प्रेम, आध्यात्मिकता और समाज सुधार को अपने काव्य का मुख्य विषय बनाया।

भक्तिकाल के प्रमुख कवियों में कबीर, तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई आदि शामिल हैं। इन कवियों ने अपने काव्य के माध्यम से समाज को नई दिशा देने का प्रयास किया।

भक्तिकाल की प्रमुख प्रवृत्तियाँ

भक्तिकाल की विशेषता उसकी विविध प्रवृत्तियाँ हैं, जो इसे अन्य साहित्यिक कालों से अलग बनाती हैं। नीचे भक्तिकाल की प्रमुख प्रवृत्तियों का विस्तृत वर्णन किया गया है।

1. ईश्वर के प्रति गहरी भक्ति

भक्तिकाल की सबसे महत्वपूर्ण प्रवृत्ति ईश्वर के प्रति अटूट भक्ति है। इस काल के कवियों ने भगवान को पाने के लिए प्रेम, समर्पण और श्रद्धा को सबसे आवश्यक माना। उनके अनुसार सच्ची भक्ति के बिना ईश्वर की प्राप्ति संभव नहीं है।

भक्त कवियों ने अपने काव्य में भगवान के प्रति अपनी भावनाओं को बहुत ही सरल और प्रभावशाली तरीके से व्यक्त किया।

2. सगुण और निर्गुण भक्ति का विकास

भक्तिकाल में भक्ति के दो प्रमुख रूप देखने को मिलते हैं –

  • सगुण भक्ति – इसमें भगवान को रूप और गुणों के साथ माना गया (जैसे राम और कृष्ण)।
  • निर्गुण भक्ति – इसमें भगवान को निराकार और बिना रूप के माना गया।

निर्गुण भक्ति के प्रमुख कवि कबीर थे, जबकि सगुण भक्ति के प्रमुख कवि तुलसीदास और सूरदास थे। यह प्रवृत्ति भक्तिकाल की एक महत्वपूर्ण पहचान है।

3. प्रेम का विशेष महत्व

भक्तिकाल में प्रेम को भक्ति का आधार माना गया। कवियों के अनुसार बिना प्रेम के भक्ति अधूरी है। इसलिए उनके काव्य में प्रेम, समर्पण और भावना की गहराई स्पष्ट दिखाई देती है।

मीरा बाई ने अपने भजनों में श्रीकृष्ण के प्रति अपने प्रेम को बहुत ही भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया है।

4. सामाजिक कुरीतियों का विरोध

भक्तिकाल के कवियों ने समाज में फैली बुराइयों जैसे – जाति-पाति, छुआछूत, अंधविश्वास और पाखंड का विरोध किया। उन्होंने समाज में समानता और भाईचारे का संदेश दिया।

कबीर ने अपने दोहों के माध्यम से इन कुरीतियों पर तीखा प्रहार किया और लोगों को सच्चे मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।

5. सरल और जनभाषा का प्रयोग

भक्तिकाल के कवियों ने कठिन संस्कृत भाषा के स्थान पर सरल और जनभाषा (ब्रजभाषा, अवधी, खड़ी बोली) का प्रयोग किया। इससे उनकी रचनाएँ आम जनता तक आसानी से पहुँच सकीं।

यह प्रवृत्ति भक्तिकाल को जनसाधारण के बीच लोकप्रिय बनाने में बहुत महत्वपूर्ण रही।

6. गुरु का महत्व

भक्तिकाल में गुरु को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया। कवियों का मानना था कि गुरु के बिना ईश्वर की प्राप्ति संभव नहीं है।

कबीर का प्रसिद्ध दोहा इस बात को स्पष्ट करता है –

"गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।।"

इस दोहे में गुरु को भगवान से भी ऊँचा स्थान दिया गया है।

7. लोककल्याण की भावना

भक्तिकाल के कवियों का उद्देश्य केवल भक्ति करना ही नहीं था, बल्कि समाज का कल्याण करना भी था। उन्होंने अपने काव्य के माध्यम से लोगों को नैतिकता, सदाचार और सच्चाई का मार्ग दिखाया।

8. भावप्रधान काव्य

भक्तिकाल का काव्य भावप्रधान होता है। इसमें अलंकारों की अपेक्षा भावों को अधिक महत्व दिया गया है। कवियों ने अपनी भावनाओं को सरल शब्दों में व्यक्त किया, जिससे पाठक आसानी से जुड़ सके।

9. भक्ति के विभिन्न रूप

भक्तिकाल में भक्ति के कई रूप देखने को मिलते हैं, जैसे –

  • दास्य भाव – भगवान को स्वामी मानकर सेवा करना
  • सख्य भाव – भगवान को मित्र मानना
  • वात्सल्य भाव – भगवान को बालक मानकर स्नेह करना
  • माधुर्य भाव – भगवान को प्रियतम मानकर प्रेम करना

इन विभिन्न भावों के माध्यम से भक्त और भगवान के संबंध को दर्शाया गया।

10. धार्मिक समन्वय की भावना

भक्तिकाल में हिंदू और मुस्लिम धर्मों के बीच समन्वय की भावना देखने को मिलती है। कवियों ने दोनों धर्मों की अच्छाइयों को अपनाने और एकता बनाए रखने की बात कही।

कबीर जैसे संतों ने यह संदेश दिया कि ईश्वर एक है और सभी धर्म समान हैं।


परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु

  • भक्तिकाल का समय – 1375 ई. से 1700 ई.
  • मुख्य विशेषता – भक्ति और प्रेम
  • सगुण और निर्गुण भक्ति का विकास
  • सरल भाषा का प्रयोग
  • समाज सुधार पर जोर
  • गुरु का महत्व

निष्कर्ष

इस प्रकार भक्तिकाल हिंदी साहित्य का एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली युग है, जिसमें भक्ति, प्रेम, समाज सुधार और आध्यात्मिकता को विशेष महत्व दिया गया।

भक्तिकाल की ये प्रवृत्तियाँ आज भी हमें सही जीवन जीने की प्रेरणा देती हैं। यह काल न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से भी अत्यंत उपयोगी है।

Arpit Nageshwar

✍️ Arpit Nageshwar

Post-graduated | Web Developer | +3 yr Experience